यज्ञ माला का एक मनका बनें और ऊर्जावान बनें
पूरे देश के सनातनी भाइयों – महादेव हर

प्राचीन संस्कृति और सनातन धर्म का केंद्रबिंदु ऐसा अपना महान राष्ट्र भारत, एक हजार साल की विधर्मियों के शासन के बाद, अंतिम दस साल में पुनः सनातन धर्म के मार्गदर्शक सिद्धांतों को साथ रखकर प्रगति और विकास का राजमार्ग तैयार कर रहा है।

हिंदू शास्त्रों के धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि
“धर्म बिना का व्यक्ति सींग-पूंछ बिना के पशु के समान है।”
भारतीय हिंदू संस्कृति आदि गगनचुंबी है। जिसके संवर्धन-संरक्षण के लिए ऋषि-मुनियों, संत-महंतों, राजा-महाराजाओं तथा श्रेष्ठजनों ने तन-मन-धन से सनातन संस्कृति का चिंतन किया है।

सनातन संस्कृति में ईश्वर की आराधना के लिए नवधा भक्ति प्रमुख है। उसमें यज्ञ-हवन की महिमा युगों से प्रचलित है। देवाधिदेव शिवजी की कृपा-आशीर्वाद पाने के लिए शिवलिंग पर किए जाने वाले अभिषेक के साथ-साथ रुद्राभिषेक का पाठ वर्तमान युग में भी कार्यरत है।

विद्वानों तथा धर्मगुरुओं के अनुसार त्रेता युग तथा द्वापर युग में भी महादेवजी का पूजन-अर्चन होता था। इसके अलावा यह भी ज्ञात हुआ है कि कोटी अतिरुद्र महायज्ञ होते रहे हैं।

ग्यारह लघुरुद्र = एक महा लघुरुद्र
ग्यारह महारुद्र = एक अतिरुद्र
ग्यारह अतिरुद्र = एक कोटी अतिरुद्र

कोटी अतिरुद्र की महानता को विशेष माना जाता है। सनातन धर्म के लिए यह गर्व और गौरव की बात है कि पुराने समय में गठित और समय के साथ भुला दिया गया ऐसा कोटी अतिरुद्र महायज्ञ अगले महीने भारत में आयोजित होने जा रहा है।

इतना ही नहीं, ऐसे महायज्ञ के अंतर्गत ज्योतिर्लिंगों के पावन स्थलों पर कोटी अतिरुद्र महायज्ञ की माला बनाई जा रही है।

गुजरात राज्य के जामनगर में स्थित समस्त ब्रह्म समाज संगठन-भारत, जिसे “छोटी काशी” के नाम से जाना जाता है, उसने लाखों वर्षों के बाद कोटी अतिरुद्र महायज्ञ के आयोजन की पहल की है।

यह महायज्ञ १९ फरवरी २०२६ से २७ फरवरी २०२६ तक भारत में स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों के पूजनीय स्थलों पर एक साथ आयोजित किया जाएगा। विद्वान शिक्षकों एवं कर्मकांडी भूदेवों की उपस्थिति में सभी बारह स्थानों पर कुल १०८ कुंडीय महायज्ञ संपन्न किए जाएंगे।

इसका मुख्य केंद्र श्री नागेश्वर महादेव मंदिर (देवभूमि द्वारका जिला) होगा।

जय श्री कृष्ण।

- श्री हर्षदभाई व्यास