श्रीमहामृत्युंजय मंत्र और महात्म्य की कहानी मृत्युलोक के हिंदुओं के लिए महावरदान स्वरूप है। मृकंडजी ऋषि और श्रुतिदेवी के विवाहित जीवन के दौरान, ऋषि दंपति को संतान सुख नहीं मिला,इसलिए उन्होंने महादेवजी की कठिनन तपस्या की और महादेवजी को प्रसन्न कर लिया।महादेव जी के वरदान स्वरूप,ऋषि दंपतिके घर में एक ऋषिकुमार का जन्म हुआ। लेकिन इस बालक की आयु केवल सोलह वर्ष ही होगी ,ऐसा महादेव जी का वरदान था उस बालक का नाम मार्कंडेय पड़ा।
बहुत कम उम्र में ही वह दुनिया में सभी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ बन गया। मार्कंडेय के गुरु ने उनके माता-पिता को, बालक को सौंपते समय कहा कि,इस दुनिया में आपके बालक की तरह उज्ज्वल कोई बालक नहीं है। आपके बालक में, सभी वेदों का ज्ञान है। सभी उपनिषदों का ज्ञान हैं। अब इससे अधिक कोई भी विद्या किसी गुरु के पास नहीं है। यह, इस दुनिया में आपका पहला पुत्र है जिसने ग्यारह साल की छोटी आयु में इन सभी शिक्षाओं को प्राप्त किया है, आप इस दुनिया में सबसे अधिक भाग्यशाली माता-पिता हैं।
गुरु के इस वचन को सुनकर, मार्कंडेयजी के माता-पिता की आँखों से आंसूआ गए। बहते हुए आंसुओं को देखकर मार्कंडेयजी ने पूछा, "मेरी उपलब्धियों को सुनकर आपके खुश होने के बजाय दु:खी होने का कारण क्या है?" कृपया मुझे बताएं..... फिर मार्कंडेयजी के माता-पिता ने शिवजी के दिए आशीर्वाद के बारे में बताया, कि हम इस विचार से दु:खी हैं कि, हम थोड़े समय में ही विद्वान पुत्र को खो देंगे। मार्कंडेयजी ने अपने माता-पिता को वचन दिया कि, आप चिंता मत कीजिए, मैं आपके आशीर्वाद और गुरुजी की कृपा से अपना जीवन पा लूंगा। इसलिए मार्कंडेयजी ने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की।और महादेव जी की इस मंत्र के साथ पूजा, अर्चना और उपासना शुरू कर दी। सोलह वर्ष की आयु पूर्ण होने के उपरांत, जब धर्मराज, महादेव के वरदान अनुसार मार्कंडेयजी के प्राण लेने आए, उस समय मार्कंडेयजी शिवालय में महामृत्युंजय मंत्र के द्वारा महादेव की पूजा,उपासना में लीन थे। मंत्र के प्रभाव के कारण, धर्मराज, मार्कंडेयजी के प्राण नहीं ले पाए। और महादेव से प्रार्थना की, कि आपके मंत्र के प्रभाव के कारण मैं इस मनुष्य के प्राण नहीं ले सकता हूं। तभी महादेवजी प्रकट हो गए और मार्कंडेयजी ने अपनी दीर्घायु की याचना की। महादेवजी ने प्रसन्न हो कर मार्कंडेयजी की बिनती को स्वीकार किया, और उन्हें दीर्घायु प्रदान कर दिया। तब धर्मराज ने महादेवजी को कहा, कि सभी जीवों की आयु समाप्ति बाद उनको मृत्यु प्राप्त होती है, इस तरह आपके दिए हुए पहले वरदान का भंग होगा। तब महादेवजी ने,धर्मराज भगवान से सुंदर वचन कहे...हे धर्मराज,मेरे पहले वरदान पर मार्कंडेय ने, मंत्र के द्वारा विजय प्राप्त कर लिया है। जिसके आधीन उन्हें मृत्यु प्राप्त होने वाली थी।और इस मंत्र के द्वारा मेरे वरदान स्वरूप मृत्यु को जीवन मे बदल दिया है, जिसको आज तीन दिन हो गये है। इसलिए, जिस मंत्र से मृत्यु पर विजय पाई है उस मंत्र को मैं महामृत्युंजय नाम देता हूं। उस वरदान ने उनके लिए मृत्यु का निर्माण नहीं किया है क्योंकि उन्होंने जिस मंत्र की रचना की है,उसे तीन दिन बीत चुके हैं और अब उन्हें दीर्घायु देने से पिछला वरदान अपने आप समाप्त हो जाता है। शिवजी ने ऋषि मार्कंडेयजी को एक और आशीर्वाद दिया कि जिस मंत्र की उन्होंने रचना की है। वह इस दुनिया में महामृत्युंजय मंत्र के नाम से स्थापित होगा, जिसका अर्थ है कि वह अकाल मृत्यु को जीतने वाला मंत्र कहलाएगा। जो लोग इस मंत्र का जाप करेंगे,वे अकाल मृत्यु से बच जायेंगे।
सभी हिंदुओं को तब से यह महान मंत्र मिला। महादेव जी के और एक वरदान का उल्लेख है...... जब, महाराज दक्ष प्रजापति की तीनों पुत्रियों का विवाह महर्षि अत्रिमुनि और माता अनसुईया के पुत्र चंद्रनारायण देव से हुआ था। चंद्रनारायण देव माता रोहिणी से विवाह करना चाहते थे, और महाराज दक्ष प्रजापति ने अपनी तीनों पुत्रियों के विवाह की शर्त चंद्रनारायण देव के सामने रखी थी। तीनों का विवाह चंद्रनारायणदेव से हुआ। परंतु चंद्रदेव को रोहिणी ज्यादा पसंद थी। महाराज दक्ष की इच्छा अनुसार, चन्द्र देव ने ,उनकी तीनों पुत्रियों के साथ विवाह किया। विवाहित जीवन में माता रोहिणी को ज्यादा स्नेह मिलता था परंतु दूसरी दो पत्नियां स्नेह से वंचित थी। महाराज दक्ष ने एक बार वसंत महोत्सव का आयोजन किया तब पिता के घर तीनों पुत्रियां आई, तब दो पुत्रियों ने अपनी माँ को अपने ह्दय की बात बताई, कि चंद्रनारायण देव जीवन में रोहिणी से ज्यादा स्नेह करते हैं, और हम दोनों विवाहित जीवन के स्नेह से वंचित हैं। क्योंकि ... हमारे पिता ने, चंद्रदेव की इच्छा न होने पर भी उनके साथ हम दोनो बहनों का कन्यादान कर दिया। माँ प्रसूति ने महाराज दक्ष से अपनी दोनो पुत्रियों की दिल की बात बताई। महाराज दक्ष ने, चंद्रनारायण देव को मनाने का अथक प्रयास किया, कि आप सप्तपदी शपथ का पालन करें और मेरी तीनों बेटियों को बराबर स्नेह दें। लेकिन चंद्रनारायण देव जिद्दी बने रहे और कहा मेरे रूप और सौंदर्य के साथ देवी रोहिणी ही शोभनीय है। इसलिए में देवी रोहिणी के बराबर का स्नेह आपकी और दो पुत्रियों को नहीं कर सकता। सिर्फ पत्नी के रूप में मैने उन्हें स्वीकार किया हैं। चंद्रनारायण देव की अहंकारी बात से महाराज दक्ष को क्रोध आया, और चंद्रदेव से कहा, "यदि आपको रूप और सौंदर्य का अहंकार है, तो आप क्षय रोग से पीड़ित होंगे।
" इस श्राप के कारण देवी-देवता चिंतित हो गए, सभी ऋषि भी चिंतित हो गए क्योंकि ... चंद्रदेव उन नौ ग्रहों में से एक हैं, यदि ग्रह मंडल का संतुलन गड़बड़ा जाता है, तो यह सृष्टि भी असंतुलित हो जाती है, उस समय माता आद्याशक्ति, महाराज दक्ष के यहां पुत्री सती के नाम से अवतार ले चुकी थी। उन्होंने सभी ऋषियों से पूछा कि क्या इस श्राप का कोई उपाय है। तब महर्षि भृगुॠषि ने माता सती से कहा कि, मार्कंडेय ऋषि शिव के भक्त हैं और उन्होंने महादेव की कृपा से महामृत्युंजय मंत्र सिद्ध किया है। , तब माता सती मार्कंडेयजी ऋषि के पास गईं और उनसे प्रार्थना की कि आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें। महामृत्युंजय मंत्र को लोक कल्याण हेतु सार्वजनिक करें। यदि आप इस मंत्र को सार्वजनिक करते हैं, तो चंद्रनारायण देव को इस कुष्ठ रोग से बचाया जा सकता है। तब मार्कंडेयजी ने भावुकता भरे स्वर कहा कि, मैं आपका बालक हूं, आपको प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है, आप माता आद्याशक्ति है। आपकी इच्छा मेरे लिए आदेश समान हैं, मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मेरा मंत्र माता आद्याशक्ति के मुख से सार्वजनिक किया जाएगा। और इस सृष्टि का कल्याण सुनिश्चित होगा। तब मार्कंडेयजी ने माता से प्रार्थना की कि माँ आपके मुख से ये मंत्र प्रभास तीर्थ में सार्वजनिक किया जाए।
तब माता ने प्रार्थना स्वीकार की, और सभी देवताओ, ऋषिमुनिओ, ब्राह्मणों के साथ प्रभास तीर्थ में महामृत्युंजय मंत्र सार्वजनिक किया। वहीं पर चंद्रनारायण देव के साथ सभी ने इस मंत्र का जप किया, तब महादेवजी प्रगट हुए। तब माता सती के साथ सभी ऋषियों, ब्राम्हणों और देवताओं ने महादेव से प्रार्थना की, कि चंद्रनारायण देव को श्राप से मुक्त करवा के ग्रहमंडल का संतुलन बचाएं। तब महादेव ने कहा, कि चंद्रनारायण देव ने अक्षयपाप किया हैं। इसीलिए महाराज दक्ष द्वारा दिया हुआ श्राप अछम्य नहीं है। चंद्रनारायण देव को,महाराज दक्ष ने अपने धर्म और कर्तव्य से विनम्रतापूर्वक सभान किया था। चन्द्र देव नेअहंकार के कारण सत्य को समझते हुए भी महाराज दक्ष की बात को स्वीकार नहीं किया। ऐसे अक्षय पाप को श्राप से मुक्ति नहीं मिल सकती, परंतु मैंने, महामृत्युंजय मंत्र को वरदान दिया है, इस मंत्र के जप करने वाले को अकाल मृत्यु, एवं अकाल मृत्यु के समान रोगों से मुक्ति मिलेगी।इस मंत्र के जप के प्रभाव से, श्राप मृत्यु तो नहीं होगी। परन्तु रोग पंद्रह दिन बढ़ता जाएगा, जीवन अस्त होने का समय जब आएगा तब में चंद्रनारायण देव को अपनी जटा में धारण कर लूंगा। और मेरी जटा के अमृत से रोग पंद्रह दिन तक घटता जाएगा। और एकदिन पूर्ण चंद्रनारायण देव के रूप में स्वस्थ रहेंगे। पूर्ण चंद्रनारायण देव पर इस रोग का कोई असर नहीं होगा। और जब तक मेरी जटा में चंद्रनारायण रहेंगे तब तक में ग्रहमंडल को संतुलित रखूँगा । फिर से सभी देवताओं, सभी ऋषियों, ने भगवान शिवजी की आरती पूजा की। आद्याशक्ति, महादेव को प्रभास तीर्थ की उपस्थिति में इस मंत्र को जनकल्याण के लिए सार्वजनिक कर दिया गया और एक और आशीर्वाद दिया गया। फिर मैं इस सृष्टि में अकाल मृत्यु से और अकाल मृत्यु जैसे रोगों से रक्षण करूंगा। जिस परिवार में इस मंत्र का जप किया जाता है उस परिवार के लोगों को मेरा आशीर्वाद प्राप्त होगा कि वे अकाल मृत्यु और अकाल मृत्यु समान रोगों से में रक्षा करूँगा,और इस मंत्र से सृष्टि के लोगों को अमृत प्राप्त हुआ है। तब महादेव शिवजी ने प्रभास तीर्थ में पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया, और जब पहला ज्योतिर्लिंग सभी हिंदू समाज को सोमनाथ महादेव के रूप में मिला, तो महादेवजी ने कहा कि इस सृष्टि में सदा के लिए मै इस ज्योतिर्लिंग स्वरूप में बिराजमान रहूंगा। इसलिए हम सभी ने इस महामंत्र के दशांश महायज्ञ का, जनकल्याण और कोरोना जैसी अकाल मृत्यु देने वाले रोगों से रक्षा के लिए आयोजन किया है। इस यज्ञ मे अपने परिवार और जनकल्याण के लिए आपको जुड़ने का हार्दिक निमंत्रण है। जब महामारी जैसे कई घातक रोग मानवजाति को समय से पहले ही मार रहे है।
श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय में महामृत्युंजय मंत्र दशांश होम महायज्ञ का आयोजन ऑनलाइन संस्कार टीवी और यूट्यूब के माध्यम से किया गया है। हम आप लोगों से कल्याणकारी यज्ञ मे ऑनलाइन जुडने हेतु निमंत्रित करतें हैं।और नव कुंडीय महायज्ञ के पुण्य से आपके कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं। सभी से अनुरोध है कि, इस महान कार्य में दिनांक: ०४-०३ से १२-०३-२०२१ तक को रोज शाम को ०५ बजे आप सब जिस स्थान पर हो उसी स्थान से इस यज्ञ मे सम्मिलित हो सकते है। सूर्यनारायण देव से हम सभी को सामूहिक रुप से यह प्रार्थना करना है कि आप कश्यप ऋषि के पुत्र हो,और हमारे ग्रह देवता भी हो, जब हम मंत्र पठन करे या श्रद्धा से श्रवण करें, उस मंत्र को आप अपने स्व हस्ते नागेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय स्थित यज्ञ शाला की यज्ञ में हमारी तरफ से आहुति दीजिये। और इस यज्ञ के पुण्य से जनकल्याण करे और हमे भी उनका पुण्य दिलाइए यही प्रार्थना है। इसी तरीके से वायुदेव को भी प्रार्थना करें कि आप ब्रह्माजी के पुत्र है,आप सभी जगह विराजमान हैं , हम सब जिस स्थान पर होंगे उसी स्थान से श्रद्धा के साथ इस यज्ञ मे सम्मिलित हो सकते है। महादेव की कृपा से जब हम सभी हिंदुओ को एक महान अवसर मिल रहा है तो, सब लोग इस अवसर में अपना समय निकाल कर शाम ०५:०० से ०५:३० सर्व जनकल्याण कार्य मे जुड़ जाए और भगवान की बड़ी कृपा पाने का सौभाग्य प्राप्त करे। या व्यापार-रोजगार के दौरान, २० मिनट के लिए सभी काम भूल कर सपरिवार एक साथ यज्ञ या प्रार्थना में अवश्य सम्मिलित हों। पूज्य भाई श्री रमेशभाई ओझाजी, हररोज शाम ०५ बजे संस्कार टीवी चैनल से और युट्युब, वेबसाइट के माध्यम से मंत्र जप से होम करवाएँगे। इस यज्ञ में, महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए अथवा, यदि मंत्र नहीं आता हो तो,केवल हाथ जोड़ के, श्रद्धा के साथ सूर्यदेव और वायुदेव के माध्यम से सम्मिलित हो जाइए। आइए हम नौ दिनों तक श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय में महामृत्युंजय दशांश महायज्ञ करने का पुण्य प्राप्त करें। हम सभी हिंदुओं से अपील करते हैं कि वे इस महायज्ञ में भाग लें। श्री ब्रह्मविकास चैरिटेबल ट्रस्ट- जामनगर द्वारा आयोजित इस महान कार्य में शामिल हों ऑनलाइन। सभी हिन्दू भाई-बहनों को महादेव हर ... जय श्री कृष्णा ...